भगवान तो भक्त के भाव के भूखे हैं : उत्तम राम शास्त्री

अजमेर। संसार में कोई भी ऐसा धर्म नहीं है या कोई भी ऐसा काम नहीं है जिसमें भाव का होना जरूरी है। किसी भी कार्य को करने से पहले तन मन धन को एकाग्र करना जरूरी है। उस कार्य में आप के भाव अगर अच्छे हैं तो वह कार्य अवश्य ही पूरा होगा।

उक्त विचार संत उत्तम राम शास्त्री ने लोहाखान मारोठ भैरव मंदिर में चल रहे श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। महाराज ने कहा भगवान राम राजा बनें यह भरत का भाव था। शबरी के भाव भक्ति पूर्ण थे और सुग्रीव के मन में दुश्मन का जासूस होने का संशय था। महाराज ने कहा कि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तह जैसी यानी आप ईश्वर को जिस रूप में देखोगे वह आपको उसी रूप में मिलेगा।

महाराज ने शबरी की भक्ति प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शबरी का निस्वार्थ प्रेम और प्रभु आगमन की राह ने उसे वर्षों तक जीवित रखा। प्रभु श्रीराम की भक्ति का संसार में भक्त और भगवान के अनूठी श्रद्धा, प्रेम और भक्ति भाव को अमर कर दिया।

महाराज ने कथा के दौरान हनुमान राम संवाद पर प्रकाश डाला तो हनुमान जी का संशय दूर हो गया और हनुमान जी ने सुग्रीव राम की मित्रता करवाई। इस दौरान भक्ति में भजनों की प्रस्तुति पर श्रद्धालु झूम उठे। कथा विश्राम के पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।

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