ब्यावर की ऐतिहासिक होली, देवर ने उंडेला रंग, भाभी ने बरसाए कोडे

रंगों और उल्लास से लबरेज होली पर्व पर ब्यावर की ऐतिहासिक कोड़ामार होली का वजूद बीते डेढ़ सौ साल बरकरार है। देवर-भाभी के बीच स्नेह से खेली जाने वाली इस होली का आनंद उठाने अपार जनसमूह उमड पडता है।

गत दो साल कोविड कोरोना काल की बंदिशों के बाद इस बार फिर कोड़ामार होली की धूम रही। जहां एक ओर देवर ने भाभी को रंग से सरोबार किया वहीं भाभी ने कोड़े बरसाए। हर्षोल्लास और मस्ती भरे माहौल में धुलंडी के दूसरे दिन शनिवार दोपहर तीन बजे शहर के मुख्य पाली बाजार में जीनगर समाज की ओर से ऐतिहासिक कोडामार होली का आयोजन हुआ।

इस दौरान जीनगर समाज ने ठाकुरजी को पालकी में सवार कर शोभायात्रा निकाली। हवा में गुलाल उछालते समाज के लोगों ने ठाकुरजी के जयकारे लगाए। सर्वप्रथम ठाकुरजी को रंग भरे कड़ाव में नहलाया गया फिर देवर-भाभी की कोड़ामार होली का आगाज हुआ।

देवरों ने कड़ाव में भरे रंग को डौलचियों में भरकर भाभियों पर उछालना शुरू कर दिया। जवाब में भाभियों ने देवरों की पीठ पर कपड़े से बने कोड़े बरसाए। कोड़ों और रंगों के आदान-प्रदान का यह क्रम काफी देर तक जारी रहा। इस होली को देखने के लिए लोग सड़क, दुकानों और मकानों की छतों पर डटे रहे।

खेल की एक अनुठी विशेषता यह हें कि देवर-भाभी संग खेली जाने वाली इस कोडामार होली मे भाभी अपने देवर को कपडे से बना कोडा मारती है, वही देवर भाभी पर डोलची से रंग फेंक कर रंगों से सरोबार करते है। इस तरह होली के त्योहार की उमंग और बाजार में रौनक अपने चरम पर पहुंच जाती है।

जीनगर समाज में मान्यता है कि महिलाएं साल भर पुरुषों का अत्याचार सहती है। साल में एक बार होली पर पुरूषों की पिटाई करने का मौका मिलता है। ब्यावर का जीनगर समाज बीते 134 साल से इस परंपरा का निर्वाह कर रहा है।

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